गद्यांश:
छात्रावस्था में मित्रता की धुन सवार रहती है। मित्रता हृदय से उमड़ पड़ती है। पीछे के जो स्नेह बंधन होते हैं, उनमें न तो उमंग रहती है, न उतनी खिन्नता। बाल-मैत्री में जो मन को प्रसन्न करने वाला आनंद होता है, वह और कहाँ? कैसी मधुरता और कैसी अनुरक्ति होती है, कैसा आपसी विश्वास होता है! हृदय से कैसे-कैसे उद्गार निकलते हैं! वर्तमान कैसा आनंदमय दिखाई पड़ता है और भविष्य के संबंध में कैसी लुभाने वाली कल्पनाएँ मन में रहती हैं। कितनी जल्दी बातें लगती हैं और कितनी जल्दी मानना होता है।
प्रश्न: 'कितनी जल्दी बातें लगती हैं।' पंक्ति में रेखांकित शब्द का अभिप्राय है—